इतिहास मायावती को बहुजन आंदोलन को बरबाद करने वाली स्वार्थी नेता के रूप में याद करेगा।
कमल किशोर कठेरिया Ex IRS
1993 में जब मान्यवर कांशीराम जी ने समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के साथ गठबंधन किया तो उस गठबंधन में लोगों ने इस देश के एससी,एसटी,ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज को सामूहिक रूप से कहे जाने वाले बहुजन समाज की एकता का सपना देखा था। वह सपना 2 जून 1995 के लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड के साथ टूट गया था। लगभग 23 वर्ष बाद 2018 में जब अखिलेश यादव के प्रयासों से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी का फिर से गठबंधन हुआ तो लोगों को लगा कि 1995 का बहुजन एकता का टूटा हुआ वह सपना अब अवश्य साकार होगा लेकिन बसपा प्रमुख कु मायावती ने अपने स्वार्थ के चलते अखिलेश यादव पर झूठे आरोप लगाकर 3 जून 2019 के दिन सपा बसपा का गठबंधन तो तोड़ा ही, साथ ही लोगों द्वारा इस गठबंधन के साथ देखा हुआ बहुजन एकता का सपना भी तोड़ दिया।
मायावती जी ने सपा से गठबंधन तोड़ते हुए कहा की गठबंधन से बसपा को कोई लाभ नहीं पहुंचा क्योंकि यादवों ने बसपा को वोट नहीं दिया। यहां पर मान्यवर कांशीराम की बहुजन विचारधारा के आधार पर एक प्रश्न उठता है कि क्या यादव बहुजन समाज का हिस्सा नहीं है? यदि हिस्सा है तो मायावती जी ने यादव समाज को बहुजन विचारधारा के अंतर्गत लाने के लिए क्या किया? अखिलेश यादव को यादव समाज को मिशनरी बनाने की सीख देने वाली मायावती जी ने यादव सहित सभी बहुजन जातियों को बहुजन विचारधारा के तहत एक करने के लिए कितने कैडर कैम्प लिए? शायद वे इस शब्द को भी भूल गयी होंगी। सच्चाई तो यह है कि बसपा में कैडर कैम्प लेने की क्षमता रखने वाले मायावती जी के आस पास फटक तक नहीं सकते और जिन लोगों से वह घिरी रहती हैं उनमें अम्बेडकरवाद पर 10 मिनट का भाषण देने की क्षमता नहीं है।
जहां तक यादव समाज द्वारा बसपा को वोट ना देने का प्रश्न है तो इंडिया टुडे के सर्वे के अनुसार 70% यादवों ने गठबंधन को वोट दिया और बाकी वोट का अधिकांश हिस्सा भाजपा को गया। इसी प्रकार जाटव समाज का भी 70 से 72% वोट गठबंधन को गया और यादव समाज की तरह ही जाटव समाज का भी शेष वोट मुख्य रूप से भाजपा को गया। अर्थात दोनों ही जातियों के वोट का अधिकांश हिस्सा गठबंधन में गया और दोनों का ही कुछ हिस्सा भाजपा को भी गया। इससे एक बात यह भी स्पष्ट होती है कि जाटव समाज में भी मायावती जी का प्रभाव कम हुआ है और उनके वोट का छोटा हिस्सा ही सही लेकिन वोट का एक हिस्सा भाजपा को भी गया है। इस बात को मायावती जी जानती हैं फिर भी गठबंधन तोड़ने के लिए पूरा ठीकरा यादव जाति पर फोड़ दिया।
गठबंधन की हार का एक महत्वपूर्ण कारण गैर जाटव दलित वर्ग का बड़ी संख्या में गठबंधन के स्थान पर भाजपा को वोट देना भी है। इस पर मायावती जी ने कुछ नहीं कहा क्योंकि यदि इस संदर्भ में भी कुछ कहती तो इन जातियों के संदर्भ में उनकी सोच और कार्यप्रणाली पर प्रश्न भी उठते। प्रश्न उठते कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? गैर जाटव दलित जातियों ने यह कदम क्यों उठाया? किन कारणों से उनका रुझान बसपा से हट गया? जब इन प्रश्नों पर चर्चा होती तो इस प्रश्न पर चर्चा अवश्य होती कि बसपा से इन जातियों का रुझान हटने के पीछे कहीं मायावती की जातिवादी सोच तो उत्तरदायी नहीं है? बसपा द्वारा इन जातियों को संगठन और राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी ना देने कि प्रश्न भी उठता। मायावती इन प्रश्नों के उत्तर देने से बचना चाहती थीं इसलिए गैर जाटव दलित जातियों के मुद्दे पर चुप्पी साध ली।
इसी तरह मुस्लिम वोटों पर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा जबकि बसपा द्वारा 10 सीटें जीतने में मुस्लिम वोटरों का मुख्य हाथ है। यदि सपा और बसपा अलग-अलग लड़तीं तो मुस्लिम वोटरों का 80% हिस्सा सपा के खाते में जाता। स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति में सपा की 5 सीटें तो आ जातीं लेकिन बसपा फिर से 0 पर ही पहुंचती।
बसपा द्वारा जीती गयी सभी 10 सीटों पर बसपा ने 45% से 52% तक वोट पाये। यह तभी मुमकिन हुआ जब यादव और मुस्लिम दोनों ने बसपा के पक्ष में बड़ी संख्या में मतदान किया।
अब प्रश्न उठता है कि ऐसा तो हो नहीं सकता कि मायावती इन तथ्यों को ना जानती हों फिर वह गठबंधन तोड़ने के लिए झूठ क्यों बोल रही हैं? दरअसल मायावती ने गठबंधन इसलिए तोड़ा ताकि गठबंधन के समझौते के तहत 2022 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद पर अखिलेश यादव को समर्थन ना देना पड़े। मायावती ने यह कदम उठाकर अपने पैरों पर तो कुल्हाड़ी मारी ही है साथ ही अखिलेश यादव के प्रयासों से हुए बसपा और सपा के गठबंधन के कारण बहुजन एकता की जो संभावना बन रही थी उसे भी समाप्त कर दिया है।
यदि मान्यवर कांशीराम जी को बाबासाहेब अंबेडकर के आंदोलन को महा आंदोलन बनाने के लिए याद किया जाएगा तो मायावती जी को इतिहास में उस महा आंदोलन को नष्ट करने वाली एक स्वार्थी नेता के रूप में याद किया जाएगा।
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सपा बसपा का गठबंन्धन बहुजन समाज के मजबूती के आधार पर देख रहे हैं तो बसपा का जब भजपा से गठबंन्धन प्रदेशमे हुआ था वो किस समाज के मजबूती के लिए किया था।वास्तविकता तो ये है कि जब जब गठबंन्धन किया वो सत्ता के लिए और उसी दिन बहुजन आंदोलन की एकता व मिशन दोनों बिखर गया।
जवाब देंहटाएंआके
जवाब देंहटाएंमायावती ने दोनों ही गठबंधन अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किए लेकिन यह भी सत्य है कि भाजपा के साथ गठबंधन बसपा की आम वोटर्स ने कभी स्वीकार नहीं किया ।यहां मैं कुछ अंध भक्तों की बात नहीं कर रहाहूं। इसके साथ दूसरी बात यह भी सत्य है कि बसपा और सपा के गठबंधन के पीछे भले ही मायावती की स्वार्थ भरी राजनीति रही हो लेकिन इस गठबंधन को दोनों दलों के वोटर्स में स्वीकार और पसंद किया क्योंकि वोटर्स को उसकी अपनी सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर यह गठबंधन स्वाभाविक गठबंधन लगा।
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