सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

सर्वोच्च न्यायालय का 7 फरवरी, 2020 का आदेश

मौलिक अधिकार के बहाने आरक्षण पर हमला 
         

                     कमल किशोर कठेरिया ex IRS 

     
      संविधान प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था पर हमले संविधान लागू होने के समय से ही हो रहे हैं और इसी कड़ी में एक खतरनाक हमला 7 फरवरी, 2020 के दिन हुआ वह भी स्वयं सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा जिस पर संविधान के प्रावधानों की आत्मा की रक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। वंचित समाज को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए और रोजगार के अवसरों में उनके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए जो आरक्षण व्यवस्था संविधान में की गई है उस पर उच्च न्यायपालिका का  रुख प्रारंभ से ही नकारात्मक रहा है। यहां तक कि संविधान में पहला संशोधन भी सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा चम्पाकम दोराई राजन बनाम मद्रास राज्य मामले[1] में आरक्षण के विरोध में दिए गए निर्णय के कारण संसद को करना पड़ा था वह भी तब जब आजाद भारत का पहला लोकसभा चुनाव भी नहीं हुआ था। तब से लेकर आज तक आरक्षण प्रणाली पर उच्च न्यायपालिका के नकारात्मक फैसलों की लंबी सूची है जिनमें आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास किया गया है। कभी मेरिट के नाम पर  तो कभी  जाति की जगह  आरक्षण का आधार आर्थिक करने के नाम पर आरक्षण व्यवस्था को  कमजोर करने के  तरह-तरह के तरीके  न्यायालय ने अपने फैसलों में  अपनाए हैं लेकिन 7 फरवरी 2020 के दिन सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण पर जो फैसला दिया वह आज तक के उसके फैसलों में सबसे अधिक खतरनाक है।

       सर्वोच्च न्यायालय ने 7 फरवरी 2020 के दिन  आरक्षण से जुड़े एक मामले में दिए गए फैसले में कहा कि सरकारी नौकरियों में नियुक्तियों और पदोन्नति के लिए आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सेवाओं में कुछ समुदायों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए राज्यों को आरक्षण देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक आरक्षण देने या न देने का फैसला पूरी तरह से राज्यों के विवेक का विषय है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उत्तराखंड से जुड़े एक मामले में आया। उसने उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए ये व्यवस्था दी है।

      इस मामले का प्रारम्भ 2012 की 5 सितंबर के दिन होता है जब उत्तराखंड सरकार ने पदोन्नति में आरक्षण दिए बिना सरकारी पदों को भरने के लिए एक अधिसूचना (Notification)[2] जारी की। आरक्षण से संबंधित 5 सितंबर 2012 के पूर्व के सभी सरकारी आदेश इस अधिसूचना के द्वारा निरस्त कर दिए गए। उत्तराखंड के पीडब्ल्यूडी डिपार्टमेंट के कर्मचारियों  जिनकी पदोन्नति होनी थी, के द्वारा उत्तराखंड उच्च न्यायालय में इस अधिसूचना को चुनौती दी गई। उच्च न्यायालय ने अपने 15 नवंबर 2019 के आदेश में 5 सितंबर 2012 की अधिसूचना को सर्वोच्च न्यायालय के इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार और जनरैल सिंह नाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता मामले में दिए गए आदेश के विपरीत कहकर निरस्त कर दिया।[3] उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता के बारे में आंकड़े एकत्र करने का निर्देश दिया जिससे राज्य सरकार आरक्षण प्रदान करने या प्रदान नहीं करने पर एक विचारशील निर्णय ले सके। उच्च न्यायालय के इस आदेश के विरोध में उत्तराखंड सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की। उत्तराखंड सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है इसलिए राज्य सरकार सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड सरकार ने बहुत सोच समझ कर पदोन्नति में आरक्षण न देने के लिए 5 सितंबर 2012 की अधिसूचना जारी की थी और इसलिए किसी भी तरह के आंकड़े एकत्र करने की आवश्यकता नहीं है। दूसरी ओर आरक्षित वर्ग के अधिवक्ताओं ने दलील दी कि अनुसूचित जाति/जनजाति के कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए राज्य सरकार अनुच्छेद 16(4) और अनुच्छेद 16(4-A) के तहत बाध्य है। इसलिए उसे पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए एम॰ नागराज मामले[4] में दिये गए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के तहत अनुसूचित जाति/जनजाति के कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व से संबन्धित आंकड़े एकत्र करने चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के निर्णय को निरस्त करते हुये 5 सितंबर 2012 की उत्तराखंड सरकार की वंचित वर्ग को आरक्षण दिये बिना नौकरी के पदों को भरने वाली अधिसूचना को बहाल कर दिया। 7 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की बेंच ने इन याचिकाओं पर फैसला[5] सुनाते हुए कहा- संविधान के अनुच्छेद 16(4) और 16(4-A) राज्य सरकारों के विवेक पर छोड़ते हैं कि वो ज़रूरत पड़ने पर आरक्षण देने की सोचें। यह स्थापित कानून है कि किसी राज्य सरकार को सरकारी नौकरी में आरक्षण देने के लिए निर्देश जारी नहीं किए जा सकते। इसी तरह राज्य सरकार अनुसूचित जाति और जनजाति को पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए भी बाध्य नहीं है। संविधान ऐसे किसी मूल अधिकार की बात नहीं करता है जिसके तहत कोई व्यक्ति पदोन्नति में आरक्षण की मांग कर सके।
      अर्थात ये प्रावधान अनुच्छेद 16(4) और अनुच्छेद 16(4 ए) राज्य सरकार को शक्ति प्रदान करते है कि राज्य यदि चाहे तो राज्य की सेवाओं में सामाजिक और  शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व कम होने पर उसे आरक्षण दे सकती है लेकिन यह केवल राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर है कि वह आरक्षण दे या न दे। यही बात पदोन्नति में आरक्षण के संबंध में भी लागू होती है।

 सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के दो निष्कर्ष बिन्दु हैं-
    1, आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है क्योंकि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) का मूल अंग नहीं है बल्कि अनुच्छेद 16(4) राज्य के पिछड़े वर्ग जिसका राज्य की राय में सेवा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, के लिए आरक्षण करने हेतु राज्य को एक विवेकाधीन शक्ति प्रदान करने वाला अर्थात सक्षम करने वाला प्रावधान है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अनुच्छेद 16 (4) अनुच्छेद 16 (1) का अपवाद है।
    2, चूंकि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है इसलिए राज्य को रोजगार में या पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसलिए यह राज्य पर छोड़ देना चाहिए की वह किसे नौकरी में आरक्षण दे या न दे। दे। इस बात को स्पष्ट करते हुए न्यायालय ने यह भी कहा कि सेवाओं में सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व कम भी हो तो भी राज्य को आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

        न्यायालय के आदेश का मुख्य आधार उसका यह मानना है कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है क्योंकि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) का भाग नहीं बल्कि राज्य को आरक्षण के संबंध में सक्षम बनाने वाला एक अपवाद प्रावधान मात्र है और चूंकि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है इस लिए राज्य को इसे देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।  
      
       चूंकि यह आदेश अनुच्छेद 16(1) और अनुच्छेद 16(4) और 16(4A) के सम्बन्ध पर आधारित है इसलिए इस मुद्दे को पूरी तरह से समझने के लिए सबसे पहले अनुच्छेद 16(1) अनुच्छेद 16(4) और अनुच्छेद 16(4A) को और उनके बीच सम्बन्ध को समझना आवश्यक है।

       अनुच्छेद 16 (1): राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी।

      अनुच्छेद 16 (4):  इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी। 

     अनुच्छेद 16(4-A): संविधान में 77वें संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 16 में एक नई धारा (4ए) जोड़ी गई ताकि अनुसूचित जाति/ जनजाति को पदोन्नति में आरक्षण दिया जा सके। नई धारा अनुच्छेद 16 (4ए) के अनुसार इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, राज्य के अधीन सेवाओं में किसी वर्ग या वर्गों के पदों पर, परिणामी ज्येष्ठता सहित पदोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।” 

          इस प्रकार भारत के संविधान का अनुच्छेद 16(1) अवसरों की समानता की बात करता है. अर्थात यदि सरकार के पास कोई नौकरी है, तो उसपर सभी का बराबर हक है। जिसके पास योग्यता है, उसे नौकरी दे दी जाएगी। लेकिन संविधान का अनुच्छेद 16(4) इस नियम में छूट देता है कि अगर सरकार को लगे कि समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों का सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है और वो पिछड़ेपन के कारण सामान्य परिस्थितियों में सेवाओं में नियुक्तियों के अवसर का लाभ नहीं उठा सकता तो सरकार उन्हें आरक्षण का लाभ दे सकती है। अनुच्छेद 16(4-A) राज्य को इस बात की छूट देता है कि सरकार  प्रतिनिधित्व की कमी को दूर करने के लिए अनुसूचित जाति और जनजाति को पदोन्नति में आरक्षण दे सकती है।
       
        अब आते हैं कोर्ट के फैसले पर। सुप्रीम कोर्ट के 7 फरवरी वाले फैसले का अर्थ है कि कोई अदालत किसी राज्य को यह आदेश नहीं दे सकती कि वो आरक्षण दे। यही बात पदोन्नति में आरक्षण पर भी लागू होती है। पदोन्नति में आरक्षण को मूलभूत अधिकारों से अलग करने का अर्थ है कि राज्य सरकार किसी विभाग में भर्ती करते समय अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए भर्ती में आरक्षण का प्रावधान नहीं करती है तो उसके निर्णय को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। न्यायालय ने आरक्षण या पदोन्नति में आरक्षण को गलत नहीं बताया है और न ही इन दोनों व्यवस्थाओं के खिलाफ कुछ कहा है। कोर्ट ने जो कहा  वो य है
        अगर राज्य सरकार अपने विवेक का इस्तेमाल करके पदोन्नति में आरक्षण देना चाहती हो, तो उसे ठोस आंकड़े जमा करने होंगे जिनसे साबित होता हो कि सरकारी नौकरियों में संबंधित वर्ग का प्रतिनिधित्व कम है ताकि यदि कोई राज्य सरकार पदोन्नति में आरक्षण देने का फैसला करे और इस निर्णय को कोर्ट में चुनौती दी जाती है तो सरकार को आंकड़े कोर्ट में पेश करने होंगे। साथ ही कोर्ट को इस सम्बध में संतुष्ट करना होगा कि किसी श्रेणी के पदों में अनुसूचित जाति/जनजाति का प्रतिनिधित्व कम है और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि संविधान के अनुच्छेद 335 के तहत ज़रूरी मानी गई सामान्य प्रशासनिक दक्षता पर इस फैसले का असर नहीं पड़ेगा।
       
      सरल भाषा में इसका अर्थ यह हुआ कि राज्य चाहें तो पदोन्नति में आरक्षण दे भी सकते हैं और नहीं भी दे सकते हैं लेकिन यदि पदोन्नति में आरक्षण देते हैं तो उस फैसले की कानूनी समीक्षा भी हो सकती है और इस समीक्षा के दौरान देखा जाएगा कि क्या पदोन्नति में आरक्षण देने के पक्ष में ठोस आंकड़े भी हैं?

 क्या आरक्षण मौलिक अधिकार है?  आरक्षण के  सम्बन्ध में न्यायालय का वर्तमान आदेश इस अवधारणा पर आधारित है कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है क्योंकि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) का भाग नहीं है बल्कि वह केवल राज्य को आरक्षण देने का अधिकार देने वाला प्रावधान है जिसे अपवाद कहा जा सकता है लेकिन मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता। यही बात अनुच्छेद 16(4-ए) के बारे में भी लागू होती है। तकनीकी रूप से देखा जाए तो संविधान का कोई अनुच्छेद यह नहीं कहता कि आरक्षण उसी प्रकार से मौलिक अधिकार है जैसे की अभिव्यक्ति की आजादी को मौलिक अधिकार माना गया है।  लेकिन अनुच्छेद 15 (4) और अनुच्छेद 16 (4) के तहत की गयी आरक्षण की व्यवस्था पर यह प्रश्न भी स्वाभाविक है कि अनुच्छेद 15 (4) और 16 (4) में निहित होने के कारण आरक्षण व्यवस्था को मौलिक अधिकार क्यों न माना जाए?  दरअसल आरक्षण मौलिक अधिकार है या नहीं, इस प्रश्न का उत्तर अनुच्छेद 16(1) और और अनुच्छेद 16(4) के परस्पर संबद्ध की व्याख्या पर निर्भर है। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के कई ऐसे निर्णय है जिनसे इस प्रश्न का उत्तर मिलता है और इस मुद्दे को समझने में आसानी होती है। 

        उत्तराखण्ड के आरक्षण से संबन्धित वर्तमान मामले में सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 16 (4) को अनुच्छेद 16 (1) का अनिवार्य अंग नहीं माना है, बल्कि उसे राज्य को पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान करने हेतु शक्ति देने वाला एक प्रावधान ही माना है। लेकिन अनुच्छेद 16(4)  और इसी प्रकार से अनुच्छेद 15 (4) की स्थिति के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों में विस्तार से चर्चा की है।

       संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ स्थित होने के कारण अनुच्छेद 15(4) और अनुच्छेद 16 (4) के मौलिक अधिकारों से संबंध को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में भी प्रारम्भ में भ्रम की स्थिति रही है। इस संबंध में सबसे पहले इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना मत .आर.बाला जी बनाम मैसूर राज्य[6]  के मामले में दिया। न्यायालय ने कहा अनुच्छेद 15 (4) के अंतर्गत दिया गया आरक्षण अनुच्छेद 15 (1) के सम्बन्ध में एक अपवाद मात्र है। 
      
       अनुच्छेद 15(1) और 15(4) के समकक्ष अनुच्छेद 16(1) और 16(4) के परस्पर संबंध पर सर्वोच्च न्यायालय में टी. देवादासन बनाम भारत सरकार के मामले[7] में व्यापक चर्चा हुई। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने बहुमत के आधार पर यही माना कि अनुच्छेद 16(4) में आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद 16(1) के समानता के अधिकार के संबंध में अपवाद स्वरूप है लेकिन समानता और आरक्षण के संबंध में अनुच्छेद 16(1) और अनुच्छेद 16(4) के परस्पर संबंध को लेकर जस्टिस सुब्बाराव का मत बेंच के अपने दूसरे साथियों से अलग आया।  जस्टिस सुब्बाराव की अनुच्छेद 16(4) की व्याख्या को बेंच के दूसरे साथी जजों ने स्वीकार नहीं किया लेकिन जस्टिस सुब्बाराव की दूसरे जज साथियों से समानता की अवधारणा के बारे में असहमति क्रांतिकारी विचारों वाली थी। जस्टिस सुब्बाराव ने कहा कि राज्य में नियुक्तियों के अवसरों के संदर्भ में अनुच्छेद 16(1) में समानता का सिद्धांत यह कहता है कि राज्य में किसी भी विभाग में रोजगार और नीतियों के सम्बन्ध में सभी नागरिकों को समान अवसर दिये जायेंगे| यदि इस बात को शाब्दिक अर्थ में कठोरता से लिया जाये तो असमानता पर आधारित सामाजिक संरचना वाले समाज में  पिछड़े समुदाय और पीछे चले जायेंगे और समानता का तथाकथित सिद्धांत एक काल्पनिक अवधारणा बनकर ही रह जायेगा। इसलिए इसे व्यवहारिक रूप देने के लिए ही संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 16 में उपबंध (4) का प्रावधान किया।कहने का अर्थ है कि जस्टिस सुब्बाराव का स्पष्ट मत था कि अनुच्छेद 16 (4) अनुच्छेद 16(1) की व्याख्या मात्र है अर्थात आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद 16(1) में ही निहित है। यदि अनुच्छेद 16(4) संविधान में नहीं भी होता तो भी अनुच्छेद 16 (1) के तहत आरक्षण दिया जा सकता  है। चूंकि अनुच्छेद 16(1) एक मौलिक अधिकार है इसलिए अनुच्छेद 16(1) का अंग होने के नाते अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण भी मौलिक अधिकार बन जाता है।
       
      अनुच्छेद 16(1) में दिए गये अवसरों के समानता के मौलिक अधिकार की व्याख्या के संबंध में जस्टिस सुब्बाराव का मत एक क्रांतिकारी विचार के रूप ही नहीं था बल्कि अनुच्छेद 16(4) के पीछे संविधान निर्माताओं की सोच को दर्शाने वाला विचार था| यह स्पष्ट है कि असमानता पर आधारित समाज में हजारों साल के शोषण के कारण सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ गयी जातियों को विशेष अवसर देकर शासन-प्रशासन या अन्य स्थानों पर यदि उनकी उचित भागेदारी सुनिश्चित नहीं की जाती है तो अनुच्छेद 16(1) के अंतर्गत अवसरों के समानता का सिद्धांत एक ढकोसले के सिवा कुछ नहीं है।  टी देवादासन के मामले में दूसरे जजों ने अनुच्छेद 16 (4) को अपवाद या उपचारात्मक प्रावधान मात्र माना जबकि जस्टिस सुब्बाराव ने अनुच्छेद 16 (4) को अनुच्छेद 16 का अभिन्न अंग माना|[8]
     
      सी.ए. राजेन्द्र बनाम भारत सरकार मामले[9] में आरक्षण के सम्बन्ध में देवादासन के मामले में जस्टिस सुबाराव के द्वारा की गयी टिप्पणी के आधार पर यह माँग की गई कि आरक्षण को अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत दिये जाने के कारण उसे मौलिक अधिकार माना जाये क्योंकि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) के लिए अपवाद नहीं बल्कि उसका एक हिस्सा है और उसकी व्याख्या है| न्यायालय ने इस विचार को खारिज़ कर दिया यह कहकर कि अनुच्छेद 16(4) सिर्फ एक उपचारात्मक प्रावधान है सामाजिक और शैक्षिणक रूप से पिछड़े वर्ग को सक्षम बनाने के लिए। अपने निर्णय में न्यायालय ने देवदासन मामले में बहुमत के निर्णय का उल्लेख किया यद्यपि जस्टिस सुबाराव के मत का खण्डन नहीं किया| स्वाभाविक  है कि यदि जस्टिस सुबाराव के मत को मान लिया जाता कि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) की स्पष्ट शब्दों में व्याख्या मात्र है और एक प्रकार से यह अनु 16(1) का ही हिस्सा है तो आरक्षण निश्चित रूप से अधिकार का मामला बन जाता है|
       
           केरल राज्य सरकार बनाम एन.एम.थोमस मामले[10] में अनुच्छेद 16 (4) का मुद्दा फिर उठा। 1975 के इस मामले में याचिकाकर्ता ने कहा अनुच्छेद 16 (4) के तहत लोगों का सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर लोगों का बंटवारा अनुच्छेद 16 (1) के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।  यद्यपि दो जजों जस्टिस एच॰आर॰ खन्ना और जस्टिस ए॰सी॰ गुप्ता ने पुराने मत का ही समर्थन करते हुये कहा कि अनुच्छेद16(4) अनुच्छेद 16(1) का अपवाद है लेकिन 7 जजों की बेंच ने बहुमत से अपने निर्णय में कहा कि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16 (1) का अपवाद नहीं है बल्कि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) में निहित समानता के लक्ष्य को प्राप्त करने का एक तरीका है|

          अवसर की समानता को स्पष्ट करते हुए जस्टिस मैथ्यू ने कहा कि अनुच्छेद 16(1) में अवसर की समानता दरअसल समानता की व्यापक अवधारणा का एक पक्ष है क्योंकि समानता के सिद्धान्त के कई अर्थ और पहलू हैं। अवसर की समानता के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि नियुक्तियों के समय सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि समाज के सभी वर्गों के लोगों को यह सन्तुष्टि हो कि उन्हें सामान अवसर मिला है| एक उदहारण देते हुए जस्टिस मैथ्यू ने कहा कि किसी सोसाइटी में सबसे अधिक सम्मानजनक एक योद्धा को माना जाता है लेकिन एक योद्धा के लिए शारीरिक ताकत की आवश्यता होती है। ऐसी परिस्थिति में योद्धा के रूप में प्रायः लोग धनी वर्ग से लिए जाते है| चूँकि बाकी जनसंख्या गरीबी के कारण कुपोषित है, उनके लोग शारीरिक ताकत के सम्बन्ध में भर्ती के समय परीक्षा में असफल हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में इस भर्ती में धन की जगह शारीरिक शक्ति की भूमिका ही महत्वपूर्ण है लेकिन यह भी एक वास्तविकता है कि जो गरीब होगा वह कमजोर भी होगा| जस्टिस मैथ्यू ने कहा कि इसलिए अनुसूचित जाति/जनजाति के संबंध में अवसर की समानता की बात करते समय उनकी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखना चाहिए। अवसर की समानता का अर्थ केवल कानूनी समानता नहीं है बल्कि पिछड़े वर्ग के पिछड़ेपन के कारकों को दूर करके समान अवसर देना है।  

        जस्टिस फैज़ल अली ने इसी मामले में अवसर की समानता के सिद्धांत पर कहा कि अवसर की समानता का स्वाभाविक अर्थ है कि किसी एक वर्ग या दूसरे वर्ग को ही नहीं बल्कि समाज के सभी वर्गों को समान अवसर देना है और यदि समाज का कोई वर्ग सामाजिक कारणों से पिछड़ गया है तो उन कारणों को दूर कर अवसर प्रदान करना है|”
     इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में स्पष्ट रूप से अनुच्छेद 16(4) को अनुच्छेद 16(1) का अपवाद या उपचारत्मक प्रावधान नहीं माना बल्कि अनुच्छेद 16(4) को अनुच्छेद 16(1) में निहित समानता के लक्ष्य को प्राप्त करने का एक तरीका बताया। यह कहा जा  सकता है कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सीधे-सीधे न सही लेकिन अनुच्छेद 16(4) को अनुच्छेद 16(1) की व्याख्या के रूप में स्वीकार कर अप्रत्यक्ष रूप से आरक्षण के प्रावधान को मौलिक अधिकार माना।

    अखिल भारतीय शोषित कर्मचारी संघ बनाम भारत सरकार मामले[11] में भी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पदों का आरक्षण और सरकारी सेवाओ में सभी स्तरो पर अनुसूचित जाति/जनजाति की भागेदारी बढ़ाने के लिए सभी उपाय अनुच्छेद 16(1) में निहित अवसर की समानता के मौलिक अधिकार के अनिवार्य परिणाम हैं। अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) का अपवाद नहीं है बल्कि उसका एक रूप है। जस्टिस चिनप्पा रेड्डी ने कहा कि अनुच्छेद 16(1) राज्य के तहत किसी भी कार्यालय में नियुक्ति के संबंध में सभी नागरिकों को अवसर की समानता की गारंटी देता है लेकिन शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए नागरिकों के रोजगार के लिए यहा गारंटी एक अच्छी सोच से अधिक कुछ नहीं होगी और वास्तविकता में यह (समानता की बात) भ्रम और हवाई बात के अतिरिक्त कुछ नहीं होगी यदि राज्य द्वारा वास्तविकता में इसे क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक कार्यवाही नहीं की जाती है। जस्टिस चिनप्पा रेड्डी ने आगे कहा कि "पदों में आरक्षण अवसर की समानता के मौलिक अधिकार का आवश्यक परिणाम है। अनुच्छेद 16(4) को अनुच्छेद 16(1) के संबंध में एक अपवाद के रूप में नहीं लिया जा सकता बल्कि यह अनुच्छेद 16(1) का ही एक पहलू है जो कि एक विशेषाधिकार प्राप्त और वंचितों के लिए विशेष संदर्भ के साथ अवसर की समानता के विचार को बढ़ावा देता है।" अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि अनुच्छेद 16(4) एक झकझोर देने वाला प्रावधान नहीं बल्कि अनुच्छेद 16(1) के निष्पक्ष क्रियावन की पूर्ति के लिए सहायक है।
      इसी प्रकार के॰सी॰ वसंत कुमार बनाम कर्नाटक सरकार[12] के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसा कोई कारण नहीं है जिससे अनुच्छेद 16(1) में अवसर की समानता की अवधारणा को संकुंचित कर दिया जाए और इसे सामाजिक न्याय और समानता की व्यापक अवधारणा में न पढ़ा जाये। समानता का अर्थ है कि असमानों के साथ समान व्यवहार नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि यह सच है कि पहली नज़र में अनुच्छेद 16 (4) राज्य के किसी भी पिछड़े वर्ग के नागरिकों के पक्ष में नियुक्तियों और पदों के आरक्षण का प्रावधान करने की शक्ति को बचाने के लिए प्रतीत होता है, लेकिन वास्तविकता में यह अनुच्छेद 16(1) का एक दूसरा रूप दिखाता है। यह वास्तव में अनुच्छेद 16(1) में मौजूद शक्ति और मान्यता को जोरदार तरीके से व्यक्त करता है ताकि कोई उस शक्ति पर कोई संदेह न करेन्यायालय कहता है कि अनुच्छेद 16 (4) अनुच्छेद 16 (1) के निर्माण को निर्देशित करने के लिए व्याख्या के एक नियम की प्रकृति में अधिक है। 
      अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) की व्याख्या है या उसका अपवाद है- इस विवाद पर सबसे अधिक स्पष्ट निर्णय सर्वोच्च न्यायालय ने इन्दिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले[13] में दिया। मण्डल मामले से विख्यात इन्दिरा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 9 जजों की बेंच ने न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) का अपवाद नहीं है बल्कि उसकी ही व्याख्या है। अनुच्छेद 16(1) और अनुच्छेद 16(4) के सम्बन्धों पर न्यायालय ने एन॰एम॰ थॉमस बनाम केरल राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का जिक्र करते हुये निर्णय देने वाले जजों के इस मत को माना कि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) द्वारा सुनिश्चित अवसर की समानता को स्पष्ट करने के लिए लोगों के उचित वर्गीकरण की अनुमति देता है क्योंकि अवसर की समानता के व्यवहार को सुनिश्चित करने के लिए कुछ स्थितियों में स्थित कुछ असमान व्यक्तियों के साथ असमान व्यवहार आवश्यक है वरना असमानता और बढ़ जाएगी। न्यायालय ने कहा कि इसलिए अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) का अपवाद नहीं बल्कि अनुच्छेद 16(1) में ही निहित वर्गीकरण की आवश्यकता का एक उदाहरण है। है। न्यायालय ने कहा कि जिस प्रकार अवसर की समानता के अधिकार वाला अनुच्छेद 16(1) अनुच्छेद 14 में समानता के सिद्धान्त में निहित है उसी प्रकार लोगों का सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर वर्गीकरण करने वाला अनुच्छेद 16(4) अवसर की समानता के मौलिक अधिकार वाले अनुच्छेद 16)(1) में ही निहित है। न्यायालय ने यह भी कहा कि वास्तव में अनुच्छेद 16(4) के बिना भी अनुच्छेद 16(1) के तहत राज्य आरक्षण लागू करने के लिए लोगों का वर्गीकरण (सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर) कर सकता है। अनुच्छेद 16(4) केवल विशिष्ट संदर्भ में मामले को संदेह से परे रखता है। इस तरह से यह स्पष्ट हो जाता है कि अनुच्छेद 16(1) में अवसर की समानता के मौलिक अधिकार में ही आरक्षण व्यवस्था के निहित होने से आरक्षण मौलिक अधिकार बन जाता है।

       इस प्रकार एन.एम. थॉमस के मामले से लेकर इंद्रा साहनी मामले तक सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों में भले ही आरक्षण को सीधे-सीधे मौलिक अधिकार न कहा हो लेकिन यह अवश्य स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) की व्याख्या है कोई अपवाद प्रावधान नहीं है। चूंकि अनुच्छेद 16(1) के तहत राज्य के अधीन किसी भी पद पर नियुक्ति के संबंध में अवसर की समानता की बात को मौलिक अधिकार माना गया है इसलिए अनुच्छेद 16(4) को अनुच्छेद 16(1) की व्याख्या मानने पर अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण का प्रावधान भी मौलिक अधिकार ही माना जाएगा। यही बात अनुच्छेद 15(4) के तहत मिले आरक्षण पर भी लागू होती है। इन सभी मामलों में निर्णय सुनने वाली बेंच तीन से लेकर नौ जजों तक की थी। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि भले ही संविधान में आरक्षण को स्पष्ट शब्दों में मौलिक अधिकार न कहा गया हो लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न मामलों में दिये गए निर्णयों के तहत आरक्षण का मूल स्त्रोत अनुच्छेद 15(1) और अनुच्छेद 16(1) में निहित होने के कारण आरक्षण मौलिक अधिकार का हिस्सा है, मौलिक अधिकार से कम कुछ नहीं है।

      जहां तक उत्तराखंड राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 7 फरवरी 2020 के आदेश का संबंध है तो इस निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी बेंच में एक पुर्नविचार याचिका दायर की जा चुकी है। बड़ी बेंच के निर्णय के विपरीत होने के कारण  सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी बेंच को पुर्नविचार याचिका पर बहस कर 7 फरवरी के आदेश को खारिज कर देना चाहिए।  सर्वोच्च न्यायालय इस विचारधीन याचिका पर क्या निर्णय देगा यह तो समय बताएगा लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि विभिन्न मामलों में सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी बेंच द्वारा अनुच्छेद 16(1) और अनुच्छेद 16(4) के सम्बन्ध में स्पष्ट निर्णय दिये  जाने के बावजूद उत्तराखंड राज्य के मामले में दो जजों ने ऐसा निर्णय दिया क्यों? क्या इन दोनों जजों को सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी बेंच के विभिन्न मामलों में दिये गए निर्णयों का पता नहीं था? स्पष्ट है कि इसका कारण मात्र जजों की जातीय मानसिकता है क्योंकी यह तो माना नहीं जा सकता की वर्तमान मामले में विवादास्पद निर्णय देने वाली जजों की बेंच को इस मुद्दे पर  सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का पता नहीं होगा जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट माना है कि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) का अपवाद नहीं है बल्कि उसकी ही व्याख्या है अर्थात यदि अनुच्छेद 16(4) न भी हो तो भी  आरक्षण अनुच्छेद 16(1) के अंतर्गत किया जा सकता है। स्पष्ट है कि सब कुछ जानते हुये भी यदि दो जजों की बेंच आरक्षण के मुद्दे पर अपने से बड़ी बेंच के निर्णय के विरुद्ध जाकर निर्णय देती है तो यह केवल जजों की जातीय मानसिकता के कारण ही संभव हो सकता है। पहले भी कई बार यह देखा गया है जब जजों ने जातीय पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर आरक्षण पर निर्णय दिया है। कई दलित अत्याचार के मामले हैं जिनमें निर्णय देते समाय जजों पर उनकी जाति हावी रही। राजस्थान के भांवरी देवी का मामले में जयपुर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने 15 नम्बर 1995 को फैसला देते हुए कहा कि चूंकि आरोपी उच्च जाति के हैं और भांवरी देवी निम्न जाति की है,  इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि उच्च जाति के इन आरोपियों ने भांवरी देवी के साथ बलात्कार किया होगा और इस प्रकार बलात्कारियों को छोड़ दिया गया।[14] निजी क्षेत्र की उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय की 11 जजों की पीठ ने 2002 में टी.एम.ए. पई फाउन्डेशन मामले[15] में जो निर्णय दिया 2005 में सर्वोच्च न्यायालय की 7 जजों की पीठ ने पी.ए इनामदार मामले[16] में दिये गए निर्णय से उलट कर विपरीत निर्णय दिया। जजों की जातीय मानसिकता पर सुप्रीम कोर्ट के  पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती का कहना है “ चूंकि जज उच्च जाति के वकीलों के वर्ग से प्रायः बनते है तो ऐसे में उनके अन्दर न चाहते हुए भी जाति को लेकर कुछ पूर्वाग्रह बन जाते है।[17]

       जस्टिस एल.नागेस्वर राव और हेमंतगुप्ता की पीठ द्वारा आरक्षण के विषय पर दिये गए वर्तमान निर्णयों का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इस निर्णयों में राज्य को अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के पक्ष में नियुक्ति और पदोन्नति के मामलों में आरक्षण देने का अधिकार दिया है। एक प्रकार से अदालत के निर्णय से अब पदोन्नति में ही नहीं प्रारम्भिक नियुक्ति के समय भी आरक्षण देना है या नहीं, यह तय करने का पूरा अधिकार राज्य सरकार को होगा भले ही इन वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व सेवाओं में कितना भी कम क्यों न हो। इससे पहले भी न्यायपालिका द्वारा विभिन्न आधारों पर आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास किया गया। आरक्षण मौलिक अधिकार है या नहीं यह प्रश्न भी न्यायपालिका में उठा और कई निर्णयों में इसे मौलिक अधिकार नहीं माना गया लेकिन अपने किसी भी निर्णय में न्यायालय ने आरक्षण देने को राज्य सरकारों की इच्छा पर नही छोड़ा है। बल्कि आरक्षण को कमजोर करने वाले अपने निर्णयों में भी न्यायपालिका ने आरक्षण के प्रावधान को अनिवार्य ही माना है। राज्य की इच्छा पर आरक्षण देने या न देने को निर्णय को छोड़ने पर यह अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के साथ अन्याय करनी की खुली छूट सरकारों को मिल जाएगी। एम. नागराज मामले में पदोन्नति में आरक्षण देने को सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की इच्छा पर छोड़ा था। जिसके परिणामस्वरूप पदोन्नति  में आरक्षण पर राज्य सरकारों ने अलग-अलग नीतियाँ अपनाई। यद्यपि अधिकांश राज्य सरकारों ने पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान किया लेकिन उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव की सरकार ने पदोन्नति में आरक्षण नहीं देने का निर्णय लिया। जिसके कारण हजारों कर्मचारियों को परेशानियों का सामना करना पड़ा, लाखों कर्मचारियों की मिली हुई पदोन्नति सरकार ने छीन ली। इसी प्रकार के हालात या यह कह सकते है कि इससे भी खतरनाक हालात सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान निर्णय के कारण पैदा हो सकते है क्योंकि वर्तमान निर्णय में पूरी आरक्षण व्यवस्था को ही राज्य सरकार की इच्छा पर ही छोड़ दिया गया है।

       सर्वोच्च न्यायालय का वर्तमान निर्णय जजों की जातीय मानसिकता के कारण वंचित वर्गों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित है। यह इस बात से भी सिद्ध होता है कि इस आदेश में न्यायालय राज्य सरकार को आरक्षण का प्रावधान न करने की उस स्थिति में भी खुली छुट देता है जब सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गो का प्रतिनिधित्व विभिन्न सेवाओं में कम भी हो। न्यायालय ने यह नहीं बताया कि यदि  सेवाओं में अनुसूचित जाति/जनजाति का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है और फिर भी राज्य इस वर्ग को आरक्षण नहीं देता है तो समानता के सिद्धान्त का अर्थ क्या होगा? लोगों के सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर वर्गीकारण को सर्वोच्च न्यायालय ने एन. एम. थॉमस मामले[18] में अनुच्छेद 16(1) के तहत अवसर की समानता के सिद्धान्त के अनुकूल माना है। अतः यदि यह वर्गीकारण समानता के मौलिक अधिकार के अनुकूल है तो पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण के प्रावधान के बिना समानता के सिद्धान्त का अनुपालन कैसे सम्भव है? एन.एम. थॉमस, अखिल भारतीय शोषित कर्मचारी संघ, के सी वसंत कुमार और इंद्रा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट मत कि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) भी व्याख्या मात्र है, के बावजूद उत्तराखंड राज्य के मामले में दो जजों की बेंच द्वारा विपरीत निर्णय दिया जाना न केवल बड़ी बेंच द्वारा खारिज करने योग्य है बल्कि संसद में इन जजों के विरुद्ध महाभियोग लगाकर इन जजों को दंडित भी किया जाना चाहिए। यदि किसी कार्यालय में उच्च अधिकारी के आदेश के विपरीत छोटे अधिकारी द्वारा निर्णय लेने पर उसे दण्ड दिया जाता है तो सर्वोच्च न्यायालय के जजों को यह छूट क्यों मिलनी चाहिए? उन्हे तो अपनी बड़ी बेंच के आदेश की अवज्ञा करने पर अधिक कठोर दण्ड मिलना चाहिए क्योंकि ऐसे जजों के इस प्रकार के मनमाने निर्णय का प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है। साथ ही संसद को कानून बनाकर आरक्षण के विषय को नौवीं अनुसूची में रख देना चाहिए ताकि जज अपनी जातीय मानसिकता के प्रभाव में आरक्षण के मुद्दे पर मनमाने निर्णय न ले सकें। लेकिन सत्ता में बैठे हुए लोगों के आरक्षण विरोधी रुख को देखते हुए ऐसा लगता नहीं है कि इन जजों के विरुद्ध कुछ होगा या आरक्षण को नौवीं अनुसूची में डालने हेतु कोई प्रयास संसद में किया जाएगा। यह कार्य केवल जन आंदोलन द्वारा ही हो सकता है।
================================================================
                  कमल किशोर कठेरिया ex IRS, संपर्क: 9910757057



[1] 1951 AIR 226, 1951 SCR 525
[6] .आई.आर.1963 एस. सी. 649
[7] 1964 AIR 179, 1964 SCR (4) 680, https://indiankanoon.org/doc/1466728/

[8] 1964 AIR 179, 1964 SCR (4) 680, https://indiankanoon.org/doc/1466728/

[9] 1968 AIR 507, 1968 SCR (1) 721, https://indiankanoon.org/doc/269704/
[11] 1981 AIR 298, 1981 SCR (2) 185
[12] 1985 AIR 1495, 1985 SCR Supl. (1) 352
[13] AIR 1993 SC 477 : 1992 Supp (3) SCC 217
[14] https://www.bbc.com/news/world-asia-india-39265653
[15] (2002) 8 एस.सी.सी.)
[16] 2005 AIR(SC) 3226
[17] पृष्ठ संख्या 201, Reservations in India: Myths and Realities- by mulchand rana
[18] 1976,एआईआर 490 1976 एससीआर (1)906

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

शहरी नक्सल का हौआ: मानवअधिकारों के संघर्ष को कुचलने की साजिश

शहरी नक्सल का हौआ: मानवअधिकारों के संघर्ष को कुचलने की साजिश                        - कमल किशोर कठेरिया पूर्व  IRS     भीमा कोरे गाँव हिंसा के मामले में देश के जाने माने पाँच ...

आजादी की 71वीं वर्षगाँठ और सत्ता का चरित्र

    आजादी की 71वीं वर्षगाँठ और सत्ता का चरित्र                                -- कमल किशोर कठेरिया                                         पूर्व आई॰आर॰एस॰ हर वर्ष की तरह इस वर...