आजादी की 71वीं वर्षगाँठ और सत्ता का चरित्र
-- कमल किशोर कठेरिया
पूर्व आई॰आर॰एस॰
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 15 अगस्त 2018 के दिन सभी देशवासियों ने आजादी का जश्न मनाया। इस मौके पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखकों ने अपने लेखों में यह आकलन करने का प्रयास किया कि आजादी के बाद पिछले वर्षों में हमने क्या पाया और क्या पाना अभी भी शेष है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र के आधारभूत मूल्यों की दृष्टि से यदि आजका विश्लेषण किया जाये और उस विश्लेषण में सत्ता के चरित्र का विश्लेषण किया जाये तो मेरी दृष्टि में पिछले चार वर्षो में सत्ता का चारित्रिक पतन जितना हुआ है उतना पहले कभी भी नही हुआ है। हमारे महापुरूषों ने जिस आजादी का सपना देखा था उसे हकीकत में बदलने के लिए उन्होने हमें संविधान दिया। यह संविधान सत्ता में बैठे वे लोगों से अपेक्षा करता है कि वे संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर सभी लोगों को बिना किसी भेदभाव के न्याय देंगे। अर्थात संवैधानिक प्रावधानों को क्रियान्वित करना ही सत्ता का प्रमुख कार्य है। दूसरे शब्दों में यह कहना अधिक उचित है कि सत्ता में कोई भी बैठा हो वह संविधान से ऊपर नहीं है, सबसे ऊपर संविधान है। लेकिन इसी भारतीय संविधान को देश की आजादी की 71वीं वर्षगाँठ के छह दिन पहले 9 अगस्त के दिन कुछ लोगों के द्वारा संसद के पास पुलिस की मौजूदगी में जलाया गया। भारतीय लोकतन्त्र के आधार भारतीय संविधान के साथ इतनी बड़ी घटना हो गयी लेकिन सत्ता के कान पर जू तक नहीं रेंगी और न ही न्यायपालिका ने इस घटना का स्वतः संज्ञान लेकर कोई कार्यवाही की। मीडिया को तो साँप ही सूंघ गया। किसी चैनल ने इस विषय पर न तो कोई चर्चा की और न ही देशभक्ति का ढिडोंरा पीटने वाले भगवा राष्ट्र प्रेमियों का इस पर कोई बयान आया।
आज सत्ता पर काबिज लोगों ने राष्ट्रवाद की परिभाषा ही बदल दी है। यदि आप उनकी विचारधारा का समर्थन करते है तो ठीक है लेकिन यदि विरोध करते है तो आप पर राष्ट्र-विरोधी का तमगा तुरन्त चिपका दिया जाता है। आज मोदी-विरोध और राष्ट्र-विरोध को एक बताने का प्रयास किया जा रहा है । जबकि मोदी स्वयं में कुछ नहीं है वे केवल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रतिनिधि है। फिर भी मोदी-विरोध को राष्ट्र-विरोध बताने पर पूर्व प्रधान मंत्री इन्दिरा गाँधी के समय की एक घटना याद आती है जब कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष देवकान्त बरूआ ने इन्दिरा गाँधी की तुलना देश से करते हुए यह कह दिया था कि Indira is India and India is Indira अर्थात इन्दिरा गाँधी ही भारत ही और भारत ही इन्दिरा गाँधी है। देवकान्त बरूआ के चाटुकारिता की हद पार करने वाले इस बयान का समर्थन करना किसी कांग्रेसी के लिए संभव नहीं हो पाया था। लेकिन आज सत्ता का चरित्र इतना गिर गया है कि मोदी विरोध को राष्ट्र विरोध के रूप में सिद्ध करने के लिए भाजपा और आर.एस.एस. की एक पूरी टीम कार्य कर रही है, जिसमें मीडिया तक के लोग शामिल है।
भारतीय संविधान इस देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना करता है और लोकतंत्र की मूलभूत शर्तों में सबसे मुख्य शर्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हैं। लेकिन विचारों को लेकर असहनशीलता इस दौर में जितनी बढ़ी है उतनी पहले कभी नही थी। नरेन्द्र दाभोलकर, एम.एम. कलबुर्गी, गोविन्द पंसारे और गौरी लंकेश जैसे लोगों को अपनी जान से हाथ इसीलिए धोना पड़ा क्योंकि एक विशेष विचारधारा के व्यक्तियों को इनके विचार पसन्द नहीं थे। इस विशेष विचारधारा के लोगों के कारण ही रोहित वेमुला जैसे होनहार छात्र को आत्महत्या करने को मजबूर होना पड़ा। प्रश्न यह उठता ही हैं कि इस विशेष विचारधारा के लोग आज इतने शाक्तिशाली कैसे हो गये कि वे अपने विचारधारा के विरोधियों की हत्या तक कर दें। इसका एक मात्र कारण है कि आज ऐसे लोगों को सत्ता का समर्थन प्राप्त है। ज्योतिवा फूले, डा. अम्बेडकर, रामास्वामी पेरियार जैसी अनेक विभूतियाँ हुई हैं जिनके विचारों का टकराव समाज के ठेकेदारों से हुआ लेकिन फिर भी वे जीवित रहें है। यह केवल इस कारण संभव हुआ कि इन लोगों के दौर में समाज के ठेकेदारों को सत्ता का समर्थन प्राप्त नहीं था। आज सामाजिक सत्ता पर जिन लोगों का अधिकार है उन्हीं के हाथ में राजनीतिक सत्ता भी है या उसी विचारधारा के लोग राजनीतिक सत्ता में हैं। इसकारण राजनीतिक सत्ता का ऐसे लोगों को समर्थन मिल जाना स्वाभाविक है। इस बात की पुष्टि गौरी लंकेश, कलबुर्गी इत्यादि की हत्या के समय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा के विभिन्न नेताओं के बयानों से होती है। इसी प्रकार की पुष्टि रोहित वेमुला के मामले में होती है, जिसमें रोहित वेमुला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने वाली परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार लोगों में हैदराबाद के स्थानीय भाजपा सांसद और केन्द्रीय मानव संसाधन मन्त्री का भी हाथ था। इस विचारधारा के लोगों को सत्ता का समर्थन प्राप्त है, यह इस बात से भी पाता चलता है कि अख्लाक के हत्यारे के शव को पुलिस की मौजूदगी में राष्ट्रध्वज से लपेटा जाता है, पहलू खाँ के हत्या का वीडियो उपलब्ध होने के बवाजूद हत्यारे को राजस्थान पुलिस के द्वारा छोड़ दिया जाता है और जब गोकशी के नाम पर एक मुस्लिम के हत्यारे जिसे अदालत द्वारा सजा दी गयी, को जेल से जमानत पर छूटने पर एक केन्द्रीय मंत्री द्वारा फूल मालाओं से सम्मानित किया जाता हैं।
बढ़ती हुई असहनशीलता का उदाहरण अभी हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की अन्त्येष्टि के समय भी देखने को मिला, जब 80 साल के आर्य समाज नेता स्वामी अग्निवेश की भाजपा के लोगों ने दिल्ली में भाजपा के मुख्यालय के गेट पर पिटाई कर दी। अग्निवेश संघ परिवार और भाजपा के विरोधी हैं लेकिन शायद वो अटल विहारी बाजपेयी का व्यक्तिगत आधार पर सम्मान करते थे और इसी लिए उन्हें श्रद्धांजलि देने भाजपा कार्यालय पहुंच गये थे। अग्निवेश के साथ घटी यह घटना मुझे पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गाँधी की अन्येष्टि के समय की याद दिलाती है जब राजीव गाँधी को श्रद्धांजलि देने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह अन्त्येष्टि स्थल पर पहुंच गये थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह वो व्यक्ति थे जिन के कारण राजीव गाँधी की सरकार को सत्ता से हटना पड़ा। ऐसे में आज के मोदी भक्तों की विचारधारा से सोचा जाये तो सोनिया गाँधी और उनके कांग्रेसी समर्थकों द्वारा विश्वनाथ प्रताप सिंह का विरोध करना चाहिए था। उन पर हमले का प्रयास भी करना चाहिए था। लेकिन उस समय ऐसा कुछ नहीं हुआ। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गाँधी को श्रद्धांजलि देने के बाद सोनिया गाँधी को हाथ जोड़कर अभिवादन किया और सोनिया गाँधी ने भी सामान्य शिष्टाचार का पालन करते हुए उनका अभिवादन स्वीकार किया।
अटल बिहारी बाजपेयी की मृत्यु के समय बहुत सारे लोगों ने सोशल मीडिया में कुछ उनके विरूद्ध लिखा। ये वो लोग है जो आर॰एस.एस. की भेदभाव वाली जाति आधारित विचार धारा को पसन्द नहीं करते है। ऐसे ही व्यक्तियों में एक मोतीहारी जिले की महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के सहायक प्राध्यापक संजय यादव हैं। संजय यादव ने फेसबुक पर अटल बिहारी बाजपेयी के विरूद्ध कुछ टिप्पणी कर दी थी जिससे कुछ लोगों ने नाराज होकर उन पर हमला कर दिया। उनकी पिटाई भी की और उनको पेट्रोल डालकर आग लगा दी। संजय यादव जैसे लोगों के लिए अटल बिहारी बाजपेयी की आलोचना फेसबुक पर करने के लिए उनकी मौत का समय उपयुक्त था या नहीं था, उनकी आलोचना के लिए कुछ दिन इन्तजार करना चाहिए था- इसबात पर नैतिकता के हिसाब से तो चर्चा हो सकती है लेकिन संविधान या कानून के हिसाब से संजय यादव जैसे लोगों ने अटल बिहारी बाजपेयी की आलोचना करके कोई गलत कार्य नहीं किया। संविधान कहीं यह नहीं कहता की किसी की मौत पर कोई उसकी आलोचना नहीं कर सकता। लेकिन यहाँ सबसे बड़ी बात यह है कि जिन लोगों को संजय यादव का कार्य पसंद नहीं आया उन्हें संजय यादव पर हमला करने का अधिकार किसने दे दिया? यदि आपने किसी की आलोचना की है और उसकी आलोचना मर्यादा के दायरे से बाहर है तो विरोधी को तो यह अधिकार है कि वह आप पर कानूनी कार्यवाही करें। लेकिन उसे यह अधिकार नहीं है कि आपके साथ हिंसक व्यवहार करें। संजय यादव के मामले में भी जिस तरह से सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ताओं ने चुप्पी दिखाई उससे भी यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे लोगों के हौसले बुलंद क्यों हैं।
सरकार झूठी खबरें फैलने से रोकने के लिए फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया पर तो नियंत्रण करने की बात करती है लेकिन सड़क पर कानून अपने हाथ में लेकर हिंसा करने वाले अपने समर्थकों पर नियंत्रण की बात नहीं करती। सत्ता के चरित्र को देखने से तो लगता है कि देश को अभी ऐसे दिन और देखने पड़ेंगे ....... ।
लेखक- कमल किशोर कठेरिया
पूर्व आई॰आर॰एस॰
दिनांक: 25/08/18
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