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शहरी नक्सल का हौआ: मानवअधिकारों के संघर्ष को कुचलने की साजिश

शहरी नक्सल का हौआ: मानवअधिकारों के संघर्ष को कुचलने की साजिश

                       -कमल किशोर कठेरिया पूर्व  IRS


    भीमा कोरे गाँव हिंसा के मामले में देश के जाने माने पाँच बुद्धिजीवी और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के साथ सत्ताधारियों की ओर से एक नया शब्द उछाला गया है, वह है अर्बन नक्सल अर्थात शहरी नक्सल। गिरफ्तार किये गये पाँच लोग वामपंथी विचारक और कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुणफ़रेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस हैं। गिरफ़्तार किए गए सभी लोग मानवाधिकार और अन्य मुद्दों को लेकर सरकार के आलोचक रहे हैं। पहले तो इन पर भीमा कोरेगाँव में हिंसा भड़काने का आरोप लगया गया। कहा गया कि इन लोगों ने एक दिन पहले अर्थात  31 दिसम्बर के दिन पुणे में आयोजित एलगार परिषद में भड़काऊ भाषण दिये। बाद मे राजीव गाँधी की हत्या के तर्ज पर इन पर पी.एम. मोदी की हत्या की साजिश रचने का इल्जाम भी लगा दिया गया। आरोप लगाया गया कि इन लोगों के घर से नक्सली साहित्य मिला है। इन्हें शहरी नक्सली कहकर सोशल मीडिया में यह प्रचार किया जा रहा है कि शहरी नक्सली आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले नक्सालियों से भी अधिक खतरनाक हैं। ये समाज और देश के लिए आतंकवाद से भी अधिक कहीं बड़ा खतरा है। ये लोग कानूनी दाव पेंच के जानकार है इस लिए इन पर लागम लगना आसान नहीं हैं।

लेकिन इन पाँच बुद्धिजीवी मानवाधिकार कार्यकर्ता को जानने वाले इस देश में बहुत से है। इन लोगों के आज तक के जीवन की गतविधियों से यह कल्पना करना बहुत ही कठिन है की यह लोग नक्सल विचारधारा के सक्रिय समर्थक हो सकते है। इस कारण इतिहासकार रोमिला थापर, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक व देवकी जैन, समाजशास्त्र के प्रोफेसर सतीश देशपांडे और मानवाधिकार अधिवक्ता मजा दारूवाला ने पुलिस की कार्यवाही के खिलाफ जनहित याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने पांचों आरोपियों की गिफ्तारी पर रोक लगा दी और अगले आदेश तक घर पर ही नजर बन्द रखने का आदेश दिया। 28 सितम्बर को दिये गये अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की बेन्च ने दो एक के बहुमत के आधार पर यद्यपि इनकी तुरन्त रिहाई की मांग और किसी अन्य एजेन्सी के द्वारा जाँच की माँग को अस्वीकार करते हुए महाराष्ट्र पुलिस को ही आगे की जाँच का आदेश दिया, लेकिन न्यायालय ने इन पांच बुद्धिजीवियों की गिफ्तारी पर फिल्हाल रोक जारी रखते हुए उन्हें चार हफ्तों के लिए  घर पर ही नजर बन्द रखने का आदेश दिया ताकि आरोपी इस दौरान अपनी बात को ट्रायल कोर्ट के सम्मुख रख सकें। यहां यह ध्यान देने योग्य बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने मामलों के तथ्यों पर, सबूतों की सत्यता या असत्यता पर कोई भी टिप्पाणी करने से इन्कार कर दिया,  उल्टे जस्टिस चन्द्रचूड़ ने तो अपने निर्णय में पुलिस की कार्यवाही की आलोचना करते हुये कहा कि महाराष्ट्र पुलिस आरोपियों के मीडिया ट्रायल में मदद कर रही है इसलिये उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। मामले के अदालत में विचारधीन होने के बावजूद और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मामले के तथ्यों पर कोई टिप्पड़ी करने से इंकार करने पर भी भाजपा के प्रवक्ता और समर्थक टी.वी. चैनलों पर और सोशल मीडिया में सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को अपनी जीत के रूप दर्शा रहें हैं, जैसे सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस की कहानी को स्वीकार कर अपना अन्तिम निर्णय सुनाया हो। इन पांच बुद्धिजीवियों को और उनके समर्थकों  को शहरी नक्सल कह कर बदनाम किया जा रहा हैं। ऐसी परिस्थितियों में मामले की गहराई में जाकर सच्चाई को जनता के सामने रखना  आवश्यक हो गया है। बहुत सारे ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर आम भारतीयों के लिए जानना आवश्यक है। क्या यह लोग वास्तव में भीमा कोरेगाँव में हिंसा के उत्तरदायी हैं? 31 दिसंबर 2017 के दिन पुणे में आयोजित एलगार परिषद किसने आयोजित की थी? और इस परिषद का क्या उद्देश्य था? जैसा कि आरोप लगाया गया है कि इन लोगों ने एलगार परिषद में इन लोगों ने भड़काने वाले भाषण दिये जिससे दूसरे दिन एक जनवरी को भीमा कोरेगाँव में हिंसा हुई इस आरोप में कितना दम हैं? इन प्रश्नों के साथ यह जानना भी आवश्यक है कि वामपंथी होना क्या देश द्रोही होना है? क्या किसी के घर पर नक्सल साहित्य मिलने का अर्थ यह है कि वह नक्सालियों की हिंसक गतविधियों में सक्रिय साझेदार हैं या उन्हें हर तरह की सहायता पहुंचा रहा हैं?

1 जनवरी 2018 के दिन भीमा कोरेगाँव में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। भीमा कोरेगाँव का दलित आन्दोलन में एक बहुत बडा़ स्थान हैं। 200 साल पहले भीमा कोरेगाँव में पेशवा की फौज और अंग्रेजों की सेना के बीच युद्ध हुआ। पेशवा की फौज में 28 हजार सैनिक थे जबकि अंग्रेज अधिकारी के पास सिर्फ 800 सैनिकों की एक टुकड़ी थी। ये सभी सैनिक महार जाति के थे। महार जाति पर पेशवाओं के राज्य में बहुत अत्याचार हुए थे। उन पर मनुस्मृति के कानून कठोरता से लागू किये गये थे। इस लिए जब अंग्रेज़ अधिकारी ने महार सैनिकों को पीछे लौटकर किसी सुरक्षित स्थान पर जाने को कहा तो महार सैनिकों ने मैदान छोड़ने से इन्कार कर दिया। क्योंकि उनके लिए यह पेशवाओं से उनके अत्याचारों का बदला लेने का मौका था। इसलिए अंग्रेज अधिकारी के भाग जाने के बावजूद 800 महार सैनिक पेशवा की 28 हजार सैनिकों की फौज से युद्ध में 12 घंटे तक डटे रहे। अंत में महार सैनिकों की प्रतिशोध की आग के समाने पेशवा की बड़ी फौज कमजोर साबित होने लगी। शाम तक पेशवा के अनेक सैनिक मार दिये गये और बाकी जान बचाकर भाग गये। इस युद्ध के बाद ही पेशवा का शासन सामप्त हो गया और पेशवा को गिरफ्तार करके कानपुर के पास बिठूर भेज दिया गया।
एक नजर से देखने पर तो यह अंगे्रजों और पेशवा के बीच हुआ युद्ध लगता है। लेकिन वास्तविकता में ये महार सैनिकों के स्वाभिमान और प्रतिशोध का युद्ध था। इसलिए प्रत्येक वर्ष एक जनवरी के दिन भीमा कोरेगाँव में बड़ी संख्या में दलित इकट्ठा होते है और अपनी इस विजय को याद करते है।

भीमा कोरेगाँव में 1 जनवरी के दिन ऐसे कार्यक्रम सैकड़ों वर्ष से चल रहें है। लेकिन कभी भी दलित समाज के साथ किसी ने हिंसक व्यवहार नहीं किया और ना ही उनके कार्यक्रम में किसी प्रकार का व्यवधान डाला। यहां तक कि जब महाराष्ट्र में शिवसेना की सरकार रही तब भी यह कार्यक्रम शांतिपूर्ण तरीके से होते रहें। लेकिन इस बार हिंसा हुई और सुनियोजित ढ़ग से हुई। दलित समाज और मराठों के बीच खाई पैदा करने की कोशिश की गई जबकि दलित समाज ने कभी इस युद्ध को मराठों और दलित महारों के बीच का युद्ध नहीं माना।  दलित समाज में यह माना जाता है कि ब्रिटिश सेना में शामिल दलित महार सैनिकों ने मराठों को नहीं बल्कि पेशवा को हराया था। बाबा साहेब अंबेडकर खुद 1927 में इन सैनिकों को श्रद्धांजलि देने वहां गए थे। लेकिन इस बार हिन्दू आगाड़ी के मिकिन्द एकबोटे और शिवप्रतिष्ठान के सम्भा जी भिड़े के नेतृत्व में योजनाबद्ध तरीके से 1 जनवरी को होने वाले कार्यक्रम का विरोध करने का निश्चय किया गया। लोगों को विशेषरूप मराठों को दलितों के विरुद्ध भड़काया गया।

जहां तक पुणे में आयोजित एलगार परिषद का संबंध है तो इस परिषद आयोजन सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस पी.वी. सावंत और बाम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस वी.जी. कोलसे पाटिल ने किया था। मराठी में एलगार का अर्थ होता हैं- ‘दृढ़संघर्ष’। जस्टिस पी.वी. सावंत ने बताया कि यह सभा इसी नाम से पहले भी 4 अक्टूबर 2015 को पूणे में आयोजित की थी। जिस का विषय था ‘‘संविधान बचाओं, देश बचाओं ’’।  31 दिसम्बर को भी इसी विषय पर पुणे में एलगार परिषद का आयोजन किया गया। दोनों सभाओं के मुख्य आयोजक पी.वी .सावंत ही थे। 31 दिसम्बर 2017 के आयोजन में जस्टिस पी.वी. सावंत के साथ जस्टिस बी.जी. कोलसे पाटिल और कबीर कलामन्च सहित 300 से अधिक सगठनों का समर्थन प्राप्त था। इस परिषद में बहुत बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए। इन में से बहुतों को दूसरें दिन भीमा कोरेगाँव में मनाये जाने वाले उत्सव में भी शामिल होना था। इस सभा का उद्देश्य केन्द्र सरकार की विफलता की ओर ध्यान आकर्षित करना था। सभा द्वारा केन्द्र और राज्य सरकार को यह संदेश देना था कि वे भारतीय संविधान से बन्धे हुए है और उन्हें संविधान के अनुसार कार्य करना चाहिए। जस्टिस कोलसे पाटिल कहते हैं कि “एलगार परिषद में हमने शपथ दिलाई कि वो किसी साम्प्रादायिक पाटी को कभी वोट नहीं देगें हम संघ के इशारों पर चलने वाले भाजपा को वोट नहीं देगे”। जस्टिस पाटिल कहते हैं सत्ताधारियों को यह शपथ पसन्द नहीं आयी इस लिए वे दूसरी कहानी बता रहें हैं कि एलगार परिषद का संबंध माओवादियों से था।

पुलिस की कार्यवाही को लेकर एक और प्रश्न उठता हैं कि यदि एलगार परिषद का संबंध माओवादियों का नक्सलवादी से था तो पुलिस ने अभी तक एलगार परिषद के आयोजक जस्टिस पी.वी. सावंत और जस्टिस कोलसे पाटिल के विरूद्ध कोई कार्यवाही क्यों नहीं की? आयोजनकर्ताओं के विरूद्ध कोई कार्यवाही न करना ही यह दर्शता हैं कि एलगार परिषद की नक्सलियों से ऐसे संबंध या परिषद में भड़काऊ ब्यान देने वाले पुलिस के सारे आरोप झूठे और तथ्यहीन हैं। ND TV सहित अनेक टी.वी. चैनलों पर एलगार परिषद के कार्यक्रम के वीडियो रिकाडिंग दिखाई गई है, जिसमें लोगों को शपथ लेते हुये दिखाया गया है कि ‘वे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा हेतु हर सम्भव प्रयास करेगें और इस संबंध में भारतीय जनता पाटी की नफरत की राजनीति को कामयाब नहीं होने देगें। ‘लेकिन पुलिस ने ऐसे वीडियो को अनदेखा करके जिस महिला ने सभा में उपस्थिति लोगों को संविधान के अनुरूप चलने की शपथ दिलाई उसे भी नक्सलवादी कहकर गिरफ्तार कर लिया गया।

दूसरी बात यह कि यदि एलगार परिषद में कुछ वाक्तओं के भाषणों से उत्तेजित होकर यह हिंसा हुई होती तो हिंसा दलित समाज द्वारा की जाती क्योंकि एलगार परिषद में उपस्थिति श्रोता अधिकाशं दलित समाज के ही थे, जबकि वास्तविकता यह है कि भीमा कोरेगाँव में हिंसा करने वाले लोग सवर्ण जाति के थे और इन लोगों को भड़काने का काम हिन्दू आगड़ी के मिकिन्द एकबोटे और शिव प्रतिष्ठान के सम्भा जी भिड़े ने किया। इनमें सम्भाजी भिड़े को मोदी जी गुरूजी कहकर सम्बोधित करते है और इन दोनों का उद्देश्य महाराष्ट्र के लोगों को भ्रमित कर उन्हें मुस्लिम विरोधी हिन्दूवादी आन्दोलन के समर्थन में लाना था। इन दोनों आरोपियों के विरोध में पुलिस में एफ.आई.आर. (शिकायत) दर्ज है, लेकिन सम्भा जी भिड़े और मिलिंद एकबोटे दोनों आजाद घूम रहें है।

पुलिस ने गिरफ्तार लोगों के घर से एक चिटठी बरामद होने का दावा किया है जिस में राजीव गाँधी की हत्या की योजना के तर्ज पर प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की बात कही गई है । लेकिन इस बात से न्यायालय को भी पुलिस सन्तुष्ट नहीं कर पाई है क्योंकि पत्र की भाषा ऐसी है कि लगता है कि कोई साधारण आदमी भी समझ जाएगा कि यह चिट्ठी झूठी है और इस झूठी चिटठी को लिखने के लिए भी पुलिस को अपने विभाग में कोई समझदार व्यक्ति नहीं मिला। जहां तक गिरफ्तार व्यक्तियों के घर से तथाकथित  नक्सली साहित्य मिलने की बात है तो यदि यह मान भी लिया जाये कि यह साहित्य नक्सल बाद से संबंधित है तो भी इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि गिरफ्तार व्यक्तियों का संबंध नक्सलियों की सक्रिय हिंसा से है। लेखक या विचारक जब कुछ लिखता है और पढ़ता तो उसके यहां हर तरह की अध्ययन की सामग्री होने की सम्भवना होती हैं । मैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का विरोधी हूँ और मेरा लेखन सदैव राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विरोध में रहा हैं, लेकिन मेरे घर पर गोलवरकर और सावरकर की लिखी अनेक पुस्तकें है। इन पुस्तकों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि मैं संघ का समर्थक हूँ। लेखक या विचारक की विचारधारा का पता उसके घर से मिलने वाले साहित्य से पता नहीं चलता बल्कि उसके लेखन और उसके भाषणों से पता चलता
है। सत्ता में बैठे लोगों की विचार धारा का विरोध करने का अधिकार भारतीय संविधान सभी को देता है। इस अधिकार को दबाया नहीं जा सकता गिरफ्तार व्यक्तियों के मामले की सुनवाई करते समय जस्टिस चन्द्रचूड़ कहते हैं कि असहमति या विरोध करने की आजादी लोकतंत्र के लिए सेफ्टी वाल्व का काम करती है। प्रेसर कुकर में सेफ्टी वाल्व बन्द होने पर जिस प्रकार प्रेसर कुकर फट जाता है उसी प्रकार विरोध करने की आजादी पर रोक लगने पर लोकतंत्र भी ध्वस्त हो जायेगा।

वर्तमान में गिरफ्तारियों को देखकर और इन गिरफ्तारियों को सत्ता पक्ष द्वारा जायज ठहराने पर जर्मनी की नाजी हुकूमत के दौर की जनता की अदालतों की याद आती हैं जब जनता की अदालतों में जर्मनी के तानाशाह हिटलर के विरोध करने पर उन्हें देश का दुश्मन कहकर उन पर मुकदमा चलाया जाता था और उनको सजा दी जाती थी। भारतीय संदर्भ में वर्तमान परस्थितियों में अभी यह तसल्ली की बात हैं कि हमारी मौजूदा न्यायिक व्यवस्था जर्मनी की जनता की अदालतों जैसी नहीं हैं, जनता का न्यायपालिका पर अभी भी विश्वास है कि वहां संविधान के अनुरूप ही न्याय मिलेगा।

लेकिन इन सारे तथ्यों के बावजूद मुख्य प्रश्न यह उठता हैं कि यदि गिरफ्तार वामपंथी बुद्धिजीवियों का भीमा कोरेगाँव की हिंसा से कोई संबंध नहीं है तब फिर सत्ता में बैठे हुए लोग शहरी नक्सलवाद का हौआ खड़ा करने का प्रयास क्यों कर रहें है? दरअसल इस शहरी नक्सलवाद के जुमले के पीछे बहुत सारे कारण है। पहली बात यह कि गौरी लंकेश, एम.एम.कलबुर्गी, गोविन्द पंसारे, दाभोलकर की हत्याओं सहित अनेक आंतकी गतिविधियों में सरकार की समर्थक महाराष्ट्र की सनातन संस्था के पदाधिकारियों की गिरफ्तारी से भी केंद्र सरकार के लिए नया संकट खड़ा हो गया था। महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार है इसलिए पुलिस पर सनातन संस्था को गलत फसाने का आरोप नहीं लगया जा सकता। साथ ही सरकार बाबा साहब अंबेडकर के विचारों के बढ़ते हुये प्रभाव से भी चिंतित है। यह बात वरवार राव के दामाद के इस आरोप से साबित होती है की उनके घर तलाशी के दौरान पुलिस ने पूछा कि – “आपके घर में इतनी किताबें क्‍यों हैं? क्‍या आपने ये सभी किताबें पढ़ी हैं? आपने इतनी किताबें क्‍यों खरीदी हैं? आप इतनी किताबें क्‍यों पढ़ते हैं? आप माओ और मार्क्स पर किताबें क्यों पढ़ रहे हैं? उन्होंने कहा कि आपके घर में फुले और अम्बेडकर की तस्वीरें क्यों हैं, लेकिन देवताओं की कोई तस्वीर नहीं है?” उनकी पत्नी से पूछा गया कि वह मांग में सिंदूर क्यों नहीं लगाती हैं?  दरअसल 2 अप्रैल 2018 के दिन जिस प्रकार दलितों ने बिना किसी संगठित नेतृत्व के सफल भारत बंद कराया जिसकी सरकार को बिलकुल उम्मीद नहीं थी, उससे सरकार परेशान है। उसे लगता है की वंचित समाज के इस आक्रोश के लिए अंबेडकर का साहित्य मूल कारण है और वहीं सुधा भारद्वाज, वरवर राव और नवलखा जैसे लोगो के उद्भव और उनके जनसमर्थन के लिए वामपंथी साहित्य जिम्मेदार है। अब सरकार इस साहित्य पर प्रतिबंध तो नहीं लगा सकती लेकिन पुलिस की मदद से ऐसे साहित्य के प्रति भय का माहौल बनान चाहती है।

सरकार की इस परेशानी के साथ एक और सच्चाई उसकी चिंता का बड़ा कारण है, वह है कि केन्द्र सरकार हर क्षेत्र में अपने कि ये हुए वादों पर असफल हुई है। महँगाई बढ़ी है, बेरोजगारी की समस्या विेकराल रूप धारण कर रहीं है। किसान आत्महत्या करने को मजबूर है और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किये गए बदलाव और उसके बाद सरकार द्वारा संसद से बिल पारित करके इस कानून को पुराने स्वरूप में पुनः लाने से सरकार का कोर वोट बैंक माना जाने वाला सवर्ण समाज भी नाराज है।  इसलिए इन सारी बातों से ध्यान हटाने के लिए नया शगूफा चाहिए था जो “शहरी नक्सलवाद” के रूप में मिला। “शहरी नक्सलवाद” का यह नया भ्रम समाज में सरकार द्वारा आतंकवाद से भी बड़े खतरे के रूप में पेश किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य उस आम भारतीय के मन को प्रभावित करना है जिसके लिए राष्ट्रवाद स्वभाविक भावना है, भले ही उसका राष्ट्रवाद अन्धा राष्ट्रवाद न हो जैसा कि सत्ता में बैठे हुए लोग चाहते है। इसीलिए शहरी नकसलवाद का हौआ खड़ा कर सरकार जहां एक ओर तमाम समस्याओं से आम जनता का ध्यान हटाना चाहती है वहीं उसका मकसद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भयभीत कर दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और अल्पसंख्यक समाज के मानवाधिकारों के संघर्ष को कुचलना चाहती है और साथ ही आम भारतीय को इतना भयभीत करना चाहती है कि वे अपने बच्चों को डा अंबेडकर और वामपंथी साहित्य से दूर रखेँ। 
            
        लेखक: कमल किशोर कठेरिया पूर्व IRS
                                 
         






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