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गणतंत्र दिवस पर गर्व: क्यों और कैसे?

गणतन्त्र दिवस पर गर्व: क्यों और कैसे?

                              --कमल किशोर कठेरिया

    

   आज हम गणतन्त्र दिवस मना रहे है । आज के दिन 1950 में भारतीय संविधान लागू हुआ था। इस दिन को गणतन्त्र दिवस इसलिए कहते है क्योंकि इस दिन राष्ट्र के प्रमुख को चुनने का अधिकार जनता को मिला । भारत का राष्ट्राध्यक्ष राष्ट्रपति होता है जिसे जनता द्वारा चुनें हुए प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता है। लेकिन राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप जनता के द्वारा होता है यह तथ्य इतना अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है क्योंकि 1947 में जब देश को अंग्रेजों से स्वतन्त्रता मिली तो देश में ऐसी कोई राजसत्ता की निशानी नहीं थी जो सत्ता के हस्तांतरण के समय देश की  सत्ता पर अपना दावा करती या अंग्रेज़ अगर चाहते भी तो देश की सत्ता उसे हस्तांतरित  कर सकते । अंग्रेजों ने इस देश को किसी एक राजा से नहीं जीता । देश पर विभिन्न राजाओं के आधीन अनेक राज्यों का समूह था। पूरा देश विभिन्न टुकड़ो में बटा हुआ था । दिल्ली के मुगल बादशाह की सत्ता दिल्ली के आस पास के कुछ क्षेत्रों तक सीमित रह गई थी । इसलिए स्पष्ट है की ऐसी परिस्थियों में 1947 में सत्ता हस्तांतरण अंग्रेजे से सीधे जनता को होनी थी । वैसे भी स्वतन्त्रता की लड़ाई जनता ने ही लड़ी थी। गाँधी, नेहरू, भगतसिंह, सुभाषचंद्रबोस, चंद्रशेखर आजाद जैसे स्वतन्त्रता सेनानी किसी राजा के प्रतिनिधि नहीं ब्लकि एक प्रकार से जनता के प्रतिनिधि थे । इसलिए गणतन्त्र दिवस का शाब्दिक अर्थ हमारे लिए महत्त्वपूर्ण नहीं। हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है कि इस दिन हमारा संविधान देश में लागू हुआ था।इसलिए हम 26 जनवरी को भारतीय संविधान के लागू होने के रूप में याद करते है । कल को संविधान को बदल दिया जाता है और यदि कोई नया संविधान देश में लागू होता है तो भले ही उस नये  सविधान में राष्ट्रपति का पद बरकरार रहें , उस चुनाव की वर्तमान प्रणाली बरकरार रहे। लेकिन यदि वह संविधान देश के वंचितों, गरीबों, किसानों, मजदूरों, के हितों के विपरीत हुआ तो उस संविधान के लागू होने की तिथि जनता के लिए इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं होगी कि जनता उस दिन को त्योहार के रूप में मना सके, जैसा की हम वर्तमान समय में 26 जनवरी के दिन को मनाते  है ।

      भारतीय संविधान देश में एक समाजवादी, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, राज्य की बात करता है सभी के साथ जाति, धर्म, लिंग से ऊपर उठकर समानता की बात करता है । लेकिन आज यह शर्म से कहना पड़ रहा हैं कि देश की बहुसंख्यक जनता सारे अधिकार होते भी उन अधिकारों को उपभोग करने में असमर्थ है । आम आदमी अपराध, भष्ट्राचार, हिंसा, आतंकवाद जैसी परिस्थियों के सामने घुटने टेक देता है । भले ही इन से लड़ने की कोशिश जारी है लेकिन अभी भी कामयाबी से कोसो दूर है हमारा संविधान एक ऐसे समाज के निर्माण करने की बात करता है , जिसमें सब समान हो, सबके हक मिले, लेकिन वहीं हमारा देश आये दिन रोज नई जातीय और धार्मिक दंगों से जल और झुलस रहा है आज भी भूख और गरीबी से लड़ते और तड़पते लोगों को सड़कों पर आसानी देखा जा सकता है । महिलायेँ देश की राजधानी दिल्ली में भी सुरक्षित नहीं है । दलितों पर जाति आधारित अत्याचार आज भी जारी है । फिर देशवासियों के लिए गणतन्त्र का जश्न मनाना कैसे महत्त्वपूर्ण हो सकता है ? इंग्लैंड गणतन्त्र नहीं है,क्योंकि वहाँ का राष्ट्राध्यक्ष जनता द्वारा नहीं चुना जाता है। लेकिन फिर भी वहाँ कि व्यवस्था को हमारे देश के मुकावले अधिक मजबूत लोकतांत्रिक कहा जा सकता है । वहाँ राज नेता वहाँ कि जनता को इतनी आसानी से मूर्ख नहीं बना सकते जैसा  कि हमारे देश में होता है । हमारे देश में वैसे तो हर एक व्यक्ति के वोट का मूल्य एक है , लेकिन चुनाव समय कहीं- कहीं तों वोट एक बोतल शराब के बदले बिक जाता है, तो कहीं दबंगों कि लाठी के आगे मजबूर हो जाता है। गणतन्त्र का अर्थ होता है गण अर्थात जनता कि इच्छा के अनुसार शासन चले, उनके कल्याण के लिए चले । लेकिन हमारे देश में शासन पूजींपतियों की इच्छा के अनुसार, उनके कल्याण के लिए अधिक चलता है।

        आज जिस प्रकार संविधान को बदलने की बात हो रही है , ऐसे में स्थिति और खतरनाक हो जाती है । संविधान की सुरक्षा का उत्तरदायित्व न्यायपालिका का है लेकिन पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों ने प्रेस काफ्रेंस करके मुख्य न्यायाधीश पर मनमाने ढंग से काम करने के आरोप लगाये और इसके बाद जिस प्रकार संघ परिवार के समर्थक इन चारों न्यायाधीशों के विरोध में आ गये, उससे स्पष्ट है कि न्याय के सर्वोच्च सदन में सब ठीक नहीं है । कुछ तो गड़बड़ है जोकि भारतीय लोकतन्त्र के लिए घातक हो सकता है ।

    आज सिस्टम में सुधार की जरूरत है,जो बिना किसी आंदोलन के सम्भव नहीं लगता,आंदोलन के लिए समाज को जागरूक करने की अवश्यकता है । जाति ,मज़हव से ऊपर उठकर देश की बात करने की जरूरत है । गरीबों, वंचितों  के बारे में जाति और धार्मिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर सोचने की आवश्यकता है ।जब यह सोच आम जनता के अन्दर आयेगी, तब देश की सरकारें, नौकरशाह, राजनीतिक दल जनता के हित के सोचने के लिए मजबूर होगें। तब ही  हम गणतन्त्र दिवस को  गर्व से मनाना सार्थक होगा।

 ..                  लेखक: कमल किशोर कठेरिया                                 

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