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आजादी के 70 वर्ष: कितने आजाद हैं हम?

              

आजादी के 70 वर्ष: कितने आजाद हैं हम?

                                                             --कमकिशोर कठेरिया

  
                        आज  15 अगस्त को अंग्रेजों से मिली आजादी के 70 वर्ष पूरे हो गये। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी लोगों ने इस दिन को हर्षोल्लास के साथ मनाया। विभिन्न संस्थानों मे तिरंगा फहराया गया। मिठाई बांटी गयी। राजनेताओं ने बड़े-बड़े भाषण दिये तो समाज के अन्य सम्मानित लोगों ने भी समाचार पत्र, टेलिविजन व इन्टरनेट के माध्यम से अपने संदेश प्रसारित करवाये। देश की आजादी के लिए लड़ने वाले अमर बलिदानियों को याद किया गया तो कहीं-कहीं उनकी याद में वृक्षारोपण किया गया। लेकिन देश के वीरों ने जिस आजादी के लिए अपना जीवन बलिदान कियाए क्या वह आजादी हमें मिली है? आजादी का अर्थ क्या है? क्या देश के विकास से हम इतना संतुष्ट हैं या हमारा जीवन इतना खुशहाल है कि हम आजादी के अर्थों में कुछ और की इच्छा ही नहीं कर सकते?


निश्चित रूप से देश ने विकास किया है। आज के भारत की 1947 के भारत से तुलना नहीं की जा सकती । सड़क निर्माण हो या भवन निर्माण, परिवहन के माध्यम हों या टेलिविजनए, मोबाइल जैसे घरेलू उपभोग की वस्तुएं हों, प्रत्येक क्षेत्र में भारत ने अभूतपूर्व प्रगति की है। देश में 20 करोड़ की आबादी वाले एक मजबूत मध्यम वर्ग का उदय हुआ है जिसे आकर्षित करने के लिए विदेशी कम्पनियाँ देश में अपनी पूंजी लगातार उड़ेल रहीं है। देश एक उभरती आर्थिक शक्ति बन चुका है।

लेकिन यदि देश की तश्वीर का यह पहलू सुखद है तो दूसरा पहलू दुखद ही नहीं भयावह है। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानक के अनुसार रोजाना अपने पर 1.25 अमेरिकी डालर अर्थात् 80 रुपये से कम खर्च कर सकने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे है। यदि इस पैमाने को लें तो देश की 78 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे आ जाती है। गरीबी रेखा को लेकर योजना आयोग के पैमाने में लगातार परिवर्तन आता रहता है। उसका सारा प्रयास आंकड़ों के खेल से गरीबों की संख्या कम करने का है, इसीलिए कभी शहर के लिए 32 रुपये और ग्रामीण क्षेत्र के लिए 27 रुपए प्रति दिन तो कभी शहर के लिए  47 रु और ग्रामीण क्षेत्र के लिए 32 रुपये प्रति दिन की कमाई को गरीबी रेखा से ऊपर कहा जाता है।  मोदी सरकार ने गरीबी रेखा नए तरीके से निश्चित करने के लिए अरविंद पनगारिया के नेतृत्व में एक  समिति बनाई लेकिन वह भी किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुँच सकी। दरअसल सरकारओं का प्रयास यही रहता है कि गरीबी रेखा कम से कम रहे ताकि विकास के आंकड़े प्रभावित न हों।

 खैर इन आंकड़ों के खेल में न पड़ें तो भी स्थिति बहुत खराब है।  संयुक्त राष्ट्र संघं के वल्र्ड फूड प्रोग्राम और एम एस स्वामीनाथन फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रिपोर्ट मे भारत में भुखमरी की स्थिति का आकलन किया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में तकरीबन 23 करोड़ लोगों को रोजाना भरपेट भोजन नहीं मिलता है। यानि देश की कुल आबादी का 20 प्रतिशत हिस्सा भुखमरी का शिकार है। द स्टेट आफ फूड इनसिकोरिटी इन द वर्ल्ड  (1911) नाम की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में भूख से जूझते लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है और यह 30 प्रतिशत है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं स्वीकार कर चुके है कि देश में 45 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार है । यह स्थिति तब है जबकि इस वर्ष देश में खाद्यान्न का उत्पादन जून 2017 में समाप्त होने वाले क्रॉप ईयर में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है। पिछले वर्ष अच्छे मॉनसून के कारण गेहूं, धान, मोटे अनाज और दालों के उत्पादन में वृद्धि हुई है। इस वर्ष अनाज का उत्पादन 27.33 करोड़ टन रहा है, जबकि जबकि देश में  अनाज की आवश्यकता लगभग 25.5 करोड़ टन है। अर्थात उत्पादन जरूरत से ज्यादा है फिर भी लोग भुखमरी का शिकार है। प्रत्येक वर्ष हजारो टन अनाज गोदामों में पड़ा सड़ जाता है लेकिन गरीब के पेट तक नहीं पहुंच पाता है । पूरे देश को भोजन कराने के लिए अनाज का रिकार्ड उत्पादन करने वाला किसान साहूकार या बैंक का कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या को मजबूर हो रहा है।  अभी हाल ही में मंदसौर में अपना ऋण माफ कराने के लिए आंदोलन कर रहे कई किसान पुलिस की गोली से मारे गए। कितने शर्म की बात है? क्या इसी आजादी के लिये भगत सिंह जैसे वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी?

 कहते हैं कि पैसा ही पैसे को खींचता है । इसी कारण अमीर और अमीर हो रहे हैं, लेकिन आम आदमी जहां पहले था वहीं आाज भी खड़ा है। 1991 में भारत में अरबपतियों की संख्या 12 थी और आज यह संख्या 101 हो गयी है।  लेकिन साथ में यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि 1991 में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 30 करोड़ थी जो आज 50 करोड़ से अधिक है।  देश की गरीबी से जूझ रही इस बड़ी आबादी को न तो चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध है और न ही शिक्षा की। निजी अस्पतालों में वह जाने की भी नहीं सोच सकता और सरकारी अस्पतालों का हाल देख कर यही लगता है कि यदि गरीब जिन्दा रहता है तो किस्मत के भरोसे ही जिन्दा रहता है। यही हाल शिक्षा का है। देश की 80 प्रतिशत आबादी के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। लेकिन 95 प्रतिशत स्कूलों में कहीं पीने का पानी नहीं है तो कहीं बिजली नहीं है। बैठने तक की जगह नहीं है। सरकारी रिपोर्ट कहती है कि 4.2 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने कभी स्कूल देखा ही नहीं है। शिक्षकों के 30 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। कक्षा 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के ही 12 लाख से अधिक पद खाली हैं। जब प्रथमिक शिक्षा का यह हाल है तो उच्च शिक्षा के बारे में इस वर्ग के सन्दर्भ में सोचना ही बेकार है क्योंकि उच्च शिक्षा 90 प्रतिशत से अधिक निजी क्षेत्र में है और इतनी मंहगी है कि गरीब सोच ही नहीं सकता।
 
बाबा साहब अंबेडकर ने राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ देश में सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना पर पूरा जोर दिया था। संविधान सभा की अंतिम बैठक में चेतावनी देते हुए डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था कि जब तक देश में सामाजिक असमानता और आर्थिक असमानता बनी रहती है तब तक राजनीतिक लोकतंत्र का कोई महत्व नहीं, इसलिए यदि देश में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना करनी है तो देश से सामाजिक और आर्थिक असमानता को दूर करना होगा। लेकिन आजादी के 70 वर्ष बाद भी हम जाति आधारित भेदभाव, लिंग आधारित भेदभाव और धर्म आधारित भेदभाव को समाज से दूर नहीं कर पाये।  चाहे रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या का मामला हो या गुजरात के उना में 5 दलित युवकों के साथ गाय के नाम पर अमानवीय व्यवहार का मामला हो, एक बात स्पष्ट है कि देश जाति आधारित सामाजिक भेदभाव से आजादी अभी बाकी है। यही बात लिंग आधारित भेदभाव के संबंध में कही जा सकती है। आए दिन समाचार पत्रों में बलात्कार के मामले छपते रहते हैं, अभी कुछ दिन पहले सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें कुछ लोग एक युवक और युवती के जोड़े को नग्न करते हैं और युवक को उसी निर्वस्त्र अवस्था में युवती को अपने कंधे पर बैठाने के लिए मजबूर कर उनका जलूस निकालते हैं। ऐसी घटनाओं  से यही साबित होता है कि समाज की वर्णवादी और सामन्तवादी सोच अभी भी गई नहीं है।

         इसी प्रकार  भारतीय संविधान में भारतीय राष्ट्र को धर्मनिरपेक्ष स्वरूप देने की बात कही गयी है। लेकिन जिस प्रकार से पिछले तीन वर्षों से देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए क्रिश्चियन और मुस्लिम समाज को आतंकित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, गोमांस के नाम पर जिस प्रकार उत्तर प्रदेश में अखलाक  और राजस्थान में पहलू खाँ की ह्त्या की गयी उससे कहीं नहीं लगता की हम धार्मिक कट्टरता की  सोच से आजाद होकर 21वीं शताब्दी में रह रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए की वर्तमान आधुनिक समय लोकतान्त्रिक मूल्यों का समय है और लोकतान्त्रिक मूल्यों में जाती, धर्म, नस्ल और लिंग आधारित भेदभाव का कोई स्थान नहीं होता।

        उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक सरकारी अस्पताल में 6 दिन के अंदर 63 बच्चों की मौत ऑक्सीजन के अभाव में हो जाती है जिनमें 36 बच्चे सिर्फ 1 दिन के अंदर मौत के मुंह में चले जाते हैं।  ऑक्सीजन का अभाव इसलिए होता है क्योंकि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी 69 लाख रुपए के बकाए के भुगतान ना होने पर ऑक्सीजन की सप्लाई बकायदा नोटिस देकर रोक देती है। लेकिन सरकार  नैतिक जिम्मेदारी लेने को भी तैयार नहीं है और सत्तारुढ़ दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष कहता है कि इतने बड़े देश में ऐसे हादसे तो होते रहते हैं।

       ऐसे में  प्रश्न उठता है कि आखिर आजादी का अर्थ क्या है? आजादी के सही मायने क्या हैं? क्या अंग्रेजों से अपने देश के नेताओं को राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण ही आजादी है? आजादी की लड़ाई मात्र सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं लड़ी गयी। आजाद भारत कैसा होगा .. इस बात की भी कल्पना की गयी थी। लेकिन आजादी की लड़ाई के किसी भी महानायक ने कभी सपने में भी आजाद भारत की आज जैसी तश्वीर की कल्पना नहीं की होगी। 

 कुछ साथी कहते हैं कि देश की यह दशा देख कर वे तो 15 अगस्त को किसी को बधाई ही नहीं देते। लेकिन जब उनसे पूछा कि इस सम्बन्ध में वे क्या करते हैं तो पता चलता है कि ऐसे शिक्षित घर बैठ कर एक दिन की छुट्टी मनाते हैं। 

                           
साथियों, 15 अगस्त का दिन न तो मात्र तिरंगा फहराने का दिन है और न ही देश की दशा देख कर उदासीन हो घर बैठने का है। निश्चित ही यह दिन हमारे लिए गर्व का दिन है क्यों कि इस दिन हमें अंग्रेजों से आजादी मिली और इस आजादी के बाद ही हमें नया संविधान मिला जिसने हमें सोचने की आजादी दी। इसलिए 15 अगस्त का दिन यह सोचने का दिन है कि जिस आजादी का सपना हमारे महापुरुषों ने देखा था, वह आजादी हमें कितनी मिली है? और यदि यह आजादी अभी  अधूरी है तो इस अधूरी आजादी को पूरा करने की जिम्मेदारी हमारी है। जिस दिन देश का हर शिक्षित यह सोचने लगेगा देश में फैली हुयी असमानता को दूर करने की दिशा में देश स्वयं बढ़ने लगेगा।


टिप्पणियाँ

  1. अतिउत्तम सर ।।
    मैं भी आपकी बातों तथा विचारधारा से पूर्णतया सहमत हूँ।।आज आजादी के इतने वर्षों बाद भी सामाजिक एवं आर्थिक सुधार केवल कुछ सीमित वर्ग का ही हुआ है।।बाबा साहब ने जिस भारत की परिकल्पना करते हुए सामाजिक सुधार की आशा की थी,उससे हम अभी भी कोसों दूर हैं।।जिस दिन राजनीतिक संगठन सामाजिक संयोजन सामूहिक देश के विकास के बारे में सोचने लगेंगे,व्यक्तिगत और वर्ग समूह के हितों से परे सोचँगे,हमारा देश प्रगति की राह में एक नया आयाम स्थापित करने में सक्षम होगा।।

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  2. धन्यवाद प्रेम सिंह जी, पंकज कुमार जी और आनंद शेखर जी।

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  3. कठेरिया जी, बहुत अच्छा लिखा है. धन्यवाद.

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  4. आदरणीय कठेरिया साहब आपके किसी भी लेख में दो राय/मत होने का सवाल ही नहीं उठता, बाबा साहेब अम्बेडकर जी के तथ्यों को आपने बखूबी परिभाषित कर हम लोगों को पारिदृश्यता के अवगत कराया । हम आभारी हैं , आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

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    उत्तर
    1. धन्यवाद। आपके शब्दों के लिए आभारी हूं ।

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  5. बहुत अच्छा लिखा है.आपने

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